नेपाल की आपदा के बाद हिमाचल प्रदेश में चंद्रा–ब्यास लिंक प्रोजेक्ट पर बढ़ी चिंता, लाहौल-कुल्लू-मंडी में सुरक्षा समीक्षा की मांग:

 लाहौल/कुल्लू/मंडी: नेपाल में हाल में हुई भीषण प्राकृतिक आपदा के बाद हिमालयी क्षेत्रों में बड़े जल और सुरंग प्रोजेक्टों की सुरक्षा को लेकर चर्चा तेज हो गई है। इसी बीच हिमाचल प्रदेश के प्रस्तावित चंद्रा–ब्यास लिंक प्रोजेक्ट को लेकर लाहौल, कुल्लू-मनाली और मंडी क्षेत्र के लोगों तथा जनप्रतिनिधियों ने परियोजना की सुरक्षा और पर्यावरणीय प्रभावों की नए सिरे से समीक्षा करने की मांग उठाई है। हालांकि, नेपाल की घटना से इस परियोजना के लिए खतरा साबित होने की बात अभी वैज्ञानिक रूप से स्थापित नहीं हुई है, लेकिन स्थानीय स्तर पर यह सवाल जरूर उठ रहा है.   कि बदलते मौसम, भूस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ के दौर में अतिरिक्त पानी को ब्यास नदी में पहुंचाने से डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों पर क्या प्रभाव पड़ेगा।


क्या है चंद्रा–ब्यास लिंक प्रोजेक्ट?










प्रस्तावित चिनाब–ब्यास लिंक परियोजना का उद्देश्य लाहौल-स्पीति की चंद्रा नदी के अतिरिक्त पानी को सुरंग के माध्यम से ब्यास नदी प्रणाली में पहुंचाना है। चंद्रा नदी आगे जाकर चिनाब नदी प्रणाली का हिस्सा बनती है। परियोजना में लाहौल के कोकसर क्षेत्र में चंद्रा नदी पर करीब 19 मीटर ऊंचे बैराज सहित अन्य संरचनाएं बनाने और पहाड़ के नीचे से पानी को ब्यास बेसिन की ओर ले जाने की योजना है। परियोजना की लागत अलग-अलग दस्तावेजों और रिपोर्टों में करीब ₹2,352 करोड़ से ₹2,356 करोड़ बताई गई है। लगभग 8.7 किलोमीटर लंबी सुरंग इस योजना का प्रमुख हिस्सा है।

परियोजना से लगभग 4,000 मेगावाट की अतिरिक्त जलविद्युत क्षमता को समर्थन मिलने की बात सरकारी परियोजना संबंधी जानकारी रिपोर्टों में कही गई है। सरकार के दृष्टिकोण से इसका उद्देश्य चिनाब बेसिन के उपलब्ध जल का अधिक उपयोग करना और ब्यास प्रणाली में पानी की उपलब्धता बढ़ाना है।



सुरंग क्यों महत्वपूर्ण है?


परियोजना की सबसे महत्वपूर्ण संरचना पीर पंजाल क्षेत्र के नीचे बनने वाली पानी की सुरंग है। अभी की रिपोर्टों के अनुसार सुरंग निर्माण में टनल बोरिंग मशीन यानी TBM तकनीक इस्तेमाल करने की तैयारी है। TBM का उद्देश्य पारंपरिक ड्रिलिंग और ब्लास्टिंग की तुलना में सतही क्षेत्र में होने वाले प्रभाव को कम करना है। परियोजना से जुड़ी रिपोर्टों में इसे पर्यावरणीय नुकसान कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण तकनीकी विकल्प बताया गया है।

हालांकि स्थानीय स्तर पर सवाल यह है कि तकनीक चाहे TBM हो या कोई अन्य निर्माण पद्धति, इतनी संवेदनशील पर्वतीय भूगर्भीय संरचना में किसी भी बड़ी सुरंग के निर्माण से पहले विस्तृत भूगर्भीय, जलवैज्ञानिक और आपदा जोखिम अध्ययन जरूरी है।


नेपाल की घटना के बाद डर क्यों बढ़ा?


नेपाल में हाल की प्राकृतिक आपदा ने हिमालयी क्षेत्र में अचानक आने वाली बाढ़, मलबे और ग्लेशियर से जुड़े खतरों को लेकर चिंता बढ़ाई है। हिमालय एक सक्रिय और संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्र है, जहां भारी बारिश, ग्लेशियरों में बदलाव, भूस्खलन और अचानक पानी बढ़ने जैसी।  घटनाएं कई स्थानों पर गंभीर नुकसान पहुंचा सकती हैं।

इसी वजह से लाहौल, कुल्लू और मंडी के लोगों की चिंता मुख्य रूप से यह है कि यदि भविष्य में ब्यास घाटी में पहले से मौजूद बाढ़ जोखिम के बीच चंद्रा का अतिरिक्त पानी भी पहुंचे, तो अत्यधिक बारिश की स्थिति में नदी प्रणाली की क्षमता पर क्या असर पड़ेगा।

यह ध्यान रखना जरूरी है कि इसका अर्थ यह नहीं है कि चंद्रा–ब्यास परियोजना निश्चित रूप से बाढ़ पैदा करेगी। इसके लिए वैज्ञानिक मॉडलिंग और विस्तृत जोखिम अध्ययन जरूरी होगा। स्थानीय लोगों की मांग भी मूल रूप से इसी बात पर केंद्रित है कि परियोजना को आगे बढ़ाने से पहले इन संभावित परिस्थितियों का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाए।


ब्यास बेसिन पहले से संवेदनशील:


कुल्लू, मंडी और आगे कांगड़ा तक ब्यास नदी का लंबा क्षेत्र मानसून के दौरान भारी बारिश और अचानक बढ़ते जलस्तर से प्रभावित हो सकता है। ऐसे में परियोजना से जुड़े लोगों और पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता यह है कि ब्यास में अतिरिक्त पानी पहुंचाने की स्थिति में अत्यधिक वर्षा, बादल फटने या अचानक बाढ़ जैसी परिस्थितियों का संयुक्त प्रभाव क्या हो सकता है।

इसी पृष्ठभूमि में BBMB द्वारा पंडोह से देहरा तक ब्यास नदी के किनारे करीब 135 किलोमीटर क्षेत्र का डैम-ब्रेक एनालिसिस और इमरजेंसी एक्शन प्लान तैयार किया जाना भी महत्वपूर्ण है। यह काम IIT रुड़की की सहायता से किया जा रहा है।


तीन रंगों में बांटा जाएगा जोखिम क्षेत्र:


BBMB की योजना के तहत पंडोह से देहरा तक के क्षेत्र को तीन जोखिम क्षेत्रों में बांटने की तैयारी है।

ग्रीन जोन: सामान्य परिस्थितियों में पानी सामान्य सीमा में रहने वाले क्षेत्र।

ब्लू जोन: पंडोह बांध से सामान्य से अधिक पानी छोड़े जाने की स्थिति में प्रभावित होने की आशंका वाले क्षेत्र।

रेड जोन: अत्यधिक पानी।  फ्लैश फ्लड, बादल फटने या अन्य गंभीर परिस्थितियों में जलमग्न होने की संभावना वाले क्षेत्र।

BBMB इन क्षेत्रों में रहने वाली आबादी और संपत्तियों की पहचान करने के साथ आपातकालीन चेतावनी और निकासी व्यवस्था को बेहतर बनाने की तैयारी कर रहा है। संभावित प्रभावित लोगों के मोबाइल नंबरों का डेटाबेस बनाने की योजना भी इसमें शामिल है।


परियोजना के पक्ष में सरकार का तर्क:


परियोजना समर्थकों का तर्क है कि चिनाब बेसिन के उपलब्ध पानी का भारत में अधिक उपयोग किया जाना चाहिए  इसके साथ ही ब्यास बेसिन में पानी बढ़ने से जलविद्युत, सिंचाई और जल प्रबंधन में लाभ मिल सकता है। लगभग 4,000 मेगावाट की अतिरिक्त जलविद्युत क्षमता को समर्थन मिलने का दावा भी परियोजना के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल है।

सरकार के लिए यह परियोजना केवल नदी जोड़ने की योजना नहीं बल्कि जल प्रबंधन, ऊर्जा और रणनीतिक बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजना के रूप में देखी जा रही है।


विरोध करने वालों की चिंता:


दूसरी ओर, लाहौल और कुल्लू क्षेत्र में कुछ स्थानीय समूहों और पर्यावरण विशेषज्ञों ने परियोजना के भूगर्भीय तथा पर्यावरणीय प्रभावों पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि पीर पंजाल और आसपास का क्षेत्र पहले से भूस्खलन तथा अन्य प्राकृतिक खतरों के प्रति संवेदनशील है।

स्थानीय लोगों का मुख्य सवाल है कि परियोजना से पहले यह स्पष्ट किया जाए कि अत्यधिक बारिश, भूस्खलन, ग्लेशियर से जुड़ी घटनाओं और फ्लैश फ्लड जैसी परिस्थितियों में परियोजना और डाउनस्ट्रीम बस्तियों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाएगी।


निष्कर्ष...


चंद्रा–ब्यास लिंक प्रोजेक्ट को लेकर फिलहाल तस्वीर दो पक्षों में दिखाई देती है। एक तरफ सरकार के लिए यह पानी के बेहतर इस्तेमाल और बिजली उत्पादन से जुड़ी महत्वपूर्ण परियोजना है। दूसरी तरफ लाहौल से लेकर कुल्लू, मंडी और कांगड़ा तक संभावित पर्यावरणीय और बाढ़ जोखिम को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

नेपाल की हालिया आपदा ने इन सवालों को और गंभीर बना दिया है। इसलिए सबसे महत्वपूर्ण मांग यही है कि परियोजना के निर्माण से पहले नया बाढ़-जोखिम आकलन, विस्तृत भूगर्भीय अध्ययन, डाउनस्ट्रीम प्रभाव का वैज्ञानिक मॉडल और आपातकालीन योजना सार्वजनिक रूप से स्पष्ट की जाए। परियोजना सुरक्षित है या नहीं, इसका अंतिम फैसला राजनीतिक दावों से नहीं बल्कि विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन से ही होना चाहिए।

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