रायपुर, छत्तीसगढ़: देश के 'धान का कटोरा' कहे जाने वाले राज्य छत्तीसगढ़ से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने सरकारी दावों और भंडारण व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के संग्रहण केंद्रों में रखा लगभग 7 करोड़ रुपये की कीमत का धान चूहों ने कुतर कर बर्बाद कर दिया है। यह मामला न केवल आर्थिक नुकसान का है, बल्कि सरकारी तंत्र की उस लापरवाही को भी दर्शाता है जहाँ किसान की मेहनत और जनता के पैसे की कोई कद्र नहीं की गई।
भंडारण की खामियां और चूहों का आतंक
छत्तीसगढ़ में हर साल लाखों मीट्रिक टन धान की खरीदी की जाती है। पर्याप्त कवर्ड गोदाम (Indoor Godowns) न होने के कारण, सरकार 'कैप स्टोरेज' (CAP Storage) का सहारा लेती है, जिसमें धान की बोरियों को ऊंचे चबूतरों पर रखकर तिरपाल से ढंक दिया जाता है।
इस मामले में भी धान को खुले मैदानों में रखा गया था। लंबे समय तक धान का उठाव (Milling के लिए परिवहन) न होने के कारण, इन केंद्रों पर चूहों की संख्या बेतहाशा बढ़ गई। सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम न होने और समय पर कीटनाशकों का छिड़काव न किए जाने के कारण चूहों ने बोरियों को काटकर धान को पूरी तरह नष्ट कर दिया।
करोड़ों का नुकसान और जिम्मेदारी किसकी?
शुरुआती आंकड़ों के अनुसार, यह नुकसान लगभग 7 करोड़ रुपये के आसपास आंका गया है। यह वह अनाज था जिसे गरीबों तक राशन के माध्यम से पहुँचना था या जिसे प्रोसेस करके बाजार में बेचा जाना था।
इस बर्बादी के पीछे तीन मुख्य कारण उभर कर सामने आ रहे हैं:
परिवहन में देरी: धान की खरीदी के बाद उसे जल्द से जल्द राइस मिलों तक पहुँचाया जाना चाहिए था, लेकिन प्रशासनिक लेटलतीफी के कारण अनाज महीनों तक खुले में पड़ा रहा।
मेंटेनेंस का अभाव: संग्रहण केंद्रों पर तैनात अधिकारियों ने चूहों और कीटों से बचाव के लिए जो सुरक्षा मानक होने चाहिए थे, उनका पालन नहीं किया।
निगरानी की कमी: करोड़ों की संपत्ति खुले में छोड़ दी गई और उच्च अधिकारियों ने समय-समय पर स्टॉक का भौतिक सत्यापन (Physical Verification) नहीं किया।
उठते सवाल और भविष्य की चुनौती
इस घटना ने राज्य की भंडारण नीति पर बड़े सवालिया निशान लगा दिए हैं। एक तरफ देश में भुखमरी और कुपोषण से निपटने के लिए अनाज बचाने पर जोर दिया जाता है, वहीं दूसरी तरफ अधिकारियों की लापरवाही से करोड़ों का अनाज मिट्टी में मिल रहा है।
विपक्ष और स्थानीय किसान संगठनों ने इस मामले में उच्च-स्तरीय जांच की मांग की है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते साइलो (Silo) या आधुनिक कवर्ड स्टोरेज की व्यवस्था नहीं की गई, तो हर साल इसी तरह जनता के टैक्स का पैसा बर्बाद होता रहेगा।
निष्कर्ष
7 करोड़ रुपये के धान की यह बर्बादी केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था की नाकामी है जिसे अनाज की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। प्रशासन ने अब इस मामले में जांच के आदेश दिए हैं, लेकिन देखना यह होगा कि क्या दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई होती है या मामला फाइलों में ही दबकर रह जाता है।
